Follow by Email

Thursday, October 12, 2017

चाँद की शाख पर

मुझे याद हैं, 2013-14 में , जब मैं  M.M. University में  पढ़ता थाएक शाम मैं घुमने निकलामैं अक्सर किसी भी शांत स्थान पर जाकर बैठ जाया करता था  जहाँ ज़्यादा लोगबाग ना आते हो  उस शाम , कुछ दूर पर एक लड़कीलगभग  10-12 साल की , जो रो रही थीं , मैले कपड़ों मेंमुझे एक रोती हुईलकड़ियाँ इकट्ठा करती दिखायी दी   वो बस उस जगह से गुज़र रही थीं 

मुझे आज भी उसके मैले कपड़े याद हैंआज भी उसकी रोती हुई परछाईं मेरे आत्मा को झकझोर देती हैं 

उस शाम के यूँ हींबार- बार,  बिना कोशिश करे , मेरे अंतर्मन की दहलीज़ पर  जाने सेकुछ शब्दकुछ सामर्थकुछ अचरजकुछ लाचारी अक्सर मेरी आँखों से रिसने लगतीं हैं,और मेरी क़लम को आगें नहीं बढ़ने देतीं 

ख़ैरएक वो शाम थीं (2013-14 )और एक आज की ये सुबह (12-10-2017) जब मैंने पहली बार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की वो कविता सुनी “वो तोड़तीं पत्थर” जो उन्होंने इलाहबाद में एक औरत को पत्थर तोड़ते देख कर लिखीं थीं  फिर मैंने अपनी diary से इस कविता को निकाला औरयहाँ रख दिया  बहुत मुश्किल था मेरे लियें ये लिखना  काश और बेहतर लिख पाया होता इसे मैं 

और उस कुछ लम्हों  के इस वाकिये  ने इस कविता को जन्म  दिया


चाँद की शाख पर

  चाँद तेरी शाख़ पर ये बारिश कैसी हैं
ढल रहा हैं सुरज जिसकी आँखों में,
उसके चेहरे पर रौशनी पाने की 
ये गुज़ारिश कैसी हैं 

कुछ लकड़ियाँ बिक जायेंगी
कुछ की रौशनी में,
सिर के ऊपर की छत को देखकर 
कुछ सकूँ  जायेगा 

कभी-कभी बस धूप -छांव में
उसके चेहरे से बरसती,
ये मुस्कुराने की चाहत कैसी हैं 

जीवन का सच भी 
पन्नों पे पड़ी रेखाओं सा हैं
शुरू होता हैं फिर ख़त्म हो जाता हैं
वो भी सोचतीं होंगीं कि
बीच-बीच में ये,
तरह-तरह की राहें कैसी हैं 

रोशन कुमार “राही


मुझे मालूम हैं कि जब तक मैं ज़िंदा रहूँगाऔर बहुत सी घटनाओं की तरह ये घटना भी मेरेमाथे की सिलवटों का हिस्सा रहेंगीं  
Read More